Rastriyshan

“कर्तव्य।। भारत के एक प्रसिद्ध संन्यासी यूरोप के दौरान फ्रांस में थे।।

कर्तव्य

भारत के एक प्रसिद्ध संन्यासी यूरोप के दौरान फ्रांस में थे। वहां उनकी मेजबान महिला ने उन्हे देश में भ्रमण कराने के लिए ए फिटन ( घोड़ागाड़ी ) किराये पर ली और दोनों पेरिस से बाहर एक गांव की ओर बढ़ने लगे। मार्ग में कोचावान ने फिटन एक जगह रोकी और नीचे उतरा। मेजबान महिला ने देखा कि एक आया कुछ बच्चो को ले जा रही थी। वे बच्चे रईस घराने के लग रहे थे। कोचवान ने जाकर उन बच्चो को लाड़—दुलार किया और बातें करके वापस आ गया। मेजवान महिला को आश्चर्य हुआ उसने कोचवान से पूछा, “ ये बच्चे किसके है?

कोचवान ने कहा, “ ये मेरे बच्चे ही है। आपने प्रसिद्ध अमुक बैंक का नाम सुना ही होगा। यह बैंक मेरा था। पिछले दिनों मुझे काफी घाव हो गया था। इस कारण बैंक बंद करना पड़ा।मैंने इस गांव में एक मकान किराये पर ले लिया है। जहां मेरी पत्नी, बच्चे एवं आया रहती है। मैं यह फिटन चलाकर अपने परिवार का पालण—पोषण करता हुँ। मुझे लेनदारों से पैसा लेना है। जब वह रकम मुझे मिल जाएगी तब मैं सब का कर्जा चुकाकर फिर से बैंक चालू कर दूंगा कोचवान की बात सुनकर वह संन्यासी बहुत प्रभावित हुए। उन्होने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जिस वेदांत दर्शन की हम बात करते है, उस पर अमल मुझे उस बैंक मालिक आचरण में देकने को मिला। एक सच्चे क्रमयोगी की तरह वह व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी नही डगमगाया और निर्भयता से अपने कर्म एवं दायित्वों का निर्वाह करता रहा। वेदांत दर्शन की यथार्थ शिक्षा यही है कि हम परिमामों की चिंता किए बिना और उनसे प्रभावित हुए बगैर निरंतर अपने कर्तव्य करते रहें। अपना आत्मिक सुख न गंवाएं और जीवन के हर उतार—चढ़ाव को सहज रूप में ले। प्रतिकुल परिस्थियों का निर्भयता से सामना करने का मार्ग ही आध्यातमिक है।

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